बुधवार, 23 जुलाई 2008

मेरी ग्यारह कविता


1. कुछ क्षण
2. उदास वीणा
3. प्रीत-प्रीत
4. मत पूछिए
5. ऐसे दीप जलाने होंगे
6. एक पुराना दर्द
7. बैठो पथिक
8. मैं शब्दों को.....
9. किसलिए
10. एक गीत
11. आस





1. कुछ क्षण
अंतस के आईने पर, कुछ क्षण गिरे हैं गल के
कितने हुए हैं भारी, फूलों से जो थे हलके
अंतस के आईने.....
सांसों की बांसुरी ने, अनबोले गीत गाए
भावों की भीनी भाशा, घुट-घुट के मरती जाए
मानस की रागिनी पर, सिसकी का बैठा पहरा
अधरों पे आते-आते, धड़कन का नाद ठहरा
लय, ताल और सरगम, बिन छंद हैं रुआंसे
पर कल्पना की गगरी, रह-रह के फिर भी छलके
अंतस के आईने.....
रूकता नहीं है रोके, मन में जो दर्द पलता
आशा का उजला सूरज, संध्या की छोर ढ़लता
न तो रस भरा सवेरा, ना ही शाम है सुनहली
सीखे थे ढ़ाई आखर, दो पल को रूह बदली
आखिर को जिन्दगी ही, वनवास हो गई है
प्यासी रही उमर भी, सागर किनारे चलके
अंतस के आईने.....
पीड़ा, चुभन, तपन ही, दे थपकियां सुलाती
अलसा के लिखते सपने, फूलों के नाम पाती
यादों के दीप जलते, सुलगे शिखा विरह की
अब चाँदनी षरद की, लगती है बहकी-बहकी
आँखों में तैरता है, सारा अतीत पल-पल
चाहत के मोती थम-थम, पलकों की राह ढ़लके
अंतस के आईने.....


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2. उदास वीणा
2. उदास वीणा
आज वीणा पर सघन छाई उदासी
तार प्यासे, तार की झनकार प्यासी
आज वीणा पर.....
खो गए अवरोह के आरोह के स्वर
रागिनी की लुट चुकी संचित धरोहर
कंठ रूंधे, हैं रूंधि सरगम की सांसे
गीत सारे हो चुके हैं चिर प्रवासी
आज वीणा पर.....
तान रूठी, बंदिशों ने बंध तोड़ा
क्या विसम क्या सम सभी ने साथ छोड़ा
भावना की पीर का वर्णन करूं क्या
ओढ़नी चंचलता ने काली निशा सी
आज वीणा पर.....
पंख सारे झड़ चुके हैं कल्पना के
रंग सारे उड़ चुके हैं अल्पना के
साध का उल्टा हुआ है व्याकरण भी
पर धड़कती है अभी आशा जरासी
आज वीणा पर....


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3. प्रीत-प्रीत

छेड़ते हैं तार वीणा के मनोहर मधुर गीत
गूंजती है रागिनी की सांस में बस प्रीत-प्रीत
छेड़ते हैं.....
स्वप्न की बगिया से उठती गंध सौंधी
मन में चपला सी सभी इच्छाएं कौंधी
नील नभ को छू रही हैं भावनाएं
ढ़क लिया सुधियों ने भी सारा अतीत
दे रही केवल सुनाई प्रीत-प्रीत
छेड़ते हैं.....
पुलकित समीरण गुनगुनाता डोलता है
बेला प्रणय की राग पंचम घोलता है
नृत्यरत तरुणाई मंजुल चांदनी की
ऋतु ने नूपुर बांधे यूं होता प्रतीत
जिनकी छम-छम से भी फूटे प्रीत-प्रीत
छेड़ते हैं.....
एक सम्मोहन सा छाया धड़कनों पर
महकी है नव कल्पना साकार हो कर
स्नेह चुम्बन से हुआ मन हर सिंगार
मादक तुम्हारा स्पर्श इतना मेरे मीत
भरदो स्वर्गिक तान में तुम प्रीत-प्रीत
छेड़ते हैं.....
व्याप्त है अन्तस में अद्भुत ताजगी
तृष्णा, तृप्ति के सुनहले तट लगी
चेतना, अनुभूति, संवेदन सभी ने
बंदिशों की तोड़ डाली सारी रीत
उन्मादित यूं कर रही है प्रीत-प्रीत
छेड़ते हैं.....


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4. मत पूछिए



क्या अजब है जिन्दगी का
सिलसिला मत पूछिए
खो गया क्या इस सफर में
क्या मिला मत पूछिए
सुख में थे सब साथ, दिन फिरते ही वो चेहरे फिरे
कल तलक बैठे थे पलकों पर नजर से अब गिरे
यह यहाँ की रीति है कि नीति है छोड़ो हिसाब
उनसे शिकायत हो कि हो
खुद से गिला मत पूछिए
क्या अजब है.....
जब कभी जीवन में टूटा, धागा स्वर्णिम आस का
सांत्वनाएँ दीं चढ़ा कर आवरण उपहास का
है सहारे के लिए अपने सभी यह सोचना
रेत का साबित हुआ क्यूँ
बस किला मत पूछिए
क्या अजब है.....
दिल में कुछ, आँखों में कुछ, होठों पे कुछ होता यहाँ
अनगिनत चेहरों का बोझा आदमी ढोता यहाँ
सिसकती है बांह भर कर भावना, संवेदना
लाया कहाँ मुखौटो का
यह काफिला मत पूछिए
क्या अजब है.....
प्यार का व्यापार संबंधों के आड़े चल रहा
आदमी को आदमी छलता या खुद को छल रहा
यूँ हुआ उत्थान मानवता का दम घुटने लगा
कैसा तरक्की दे रही है
यह सिला मत पूछिए
क्या अजब है.....
किस जगह ठहरेगा जाकर, दौर ये अब क्या पता
मनुज का कितना गिराएगी उसी की स्वार्थता
हसिए इतने सिमट कर रह गए हैं सोच के
अब जिन्दगी लगने लगी
क्यूँ कातिला मत पूछिए
क्या अजब है.....


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5. ऐसे दीप जलाने होंगे

ऐसे दीप जलाने होंगे
ज्योतिर्मय जगती करने को
भेदभाव का तम हरने को
शिखा-शिखा पर संकल्पों के
अग्निपुंज बैठाने होंगे
ऐसे दीप.....
ड्योढ़ी-ड्योढ़ी हो अपनापन
अपनेपन में जीवन दर्शन
जीवन दर्शन के प्रकाश हित
अन्तस्थल खटकाने होंगे
ऐसे दीप.....
प्रेम-प्रीत का ही उजास हो
प्यासी कोई नहीं प्यास हो
तेल और बाती की तरह
मन के तार मिलाने होंगे
ऐसे दीप.....
भाईचारा प्रथम ध्यैय हो
और एकता भी अजेय हो
ईर्ष्या और द्वेश को तजकर
स्नेहिल हाथ बढ़ाने होंगे
ऐसे दीप.....
वर्गों की सारी कड़ियों तक
प्रासादों से झौंपड़ियों तक
समतामय सोनल प्रकाश के
सन्देशे पहुंचाने होंगे
ऐसे दीप.....
किरण-किरण भी श्लोक सुनाए
हर घर देवालय हो जाए
फलित साध यह मन की करने
तम के गात गलाने होंगे
ऐसे दीप.....
रहे दिशा ना कोई काली
हरषे चारों ओर दीवाली
यही कामना लक्ष्य बना कर
गीत सृजन के गाने होंगे
ऐसे दीप.....


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6. एक पुराना दर्द

एक पुराना दर्द अभी तक दस्तक देता घड़ी-घड़ी
हर दस्तक सीने में बनकर पीड़ादायक शूल गड़ी
नस-नस में रौएं-रौएं में इक सिहरन सी छाती है
सांसों की अति कोमल डोरी बिन खींचे तन जाती है
उदासियों का क्रूर भंवर भी लील रहा मुस्कानें मन की
आशाओं की दीप-शिखा पर भी आंधी मंडराती है
झुलस रहा है स्वप्न नीड़ भी कड़क के ऐसी गाज पड़ी
एक पुराना दर्द.....
इतना गहरा जाने कैसा इससे मेरा नाता है
जबसे होश संभाला मैंने तबसे साथ निभाता है
हूँ इससे नाराज सदा से दुत्कारा, धिक्कारा इसको
फिर भी यही हौसले मेरे आड़े समय बढ़ाता है
अजब से रिश्ते की अजीब सी जोड़ी इसने कड़ी-कड़ी
एक पुराना दर्द.....
चाहा इसको गीत सिखादूँ देदूँ हाथों में इकतारा
बैठ सामने छेड़ मधुर धुन पुलकित करदे जीवन सारा
लेकिन इसको नेह सरीखा शब्द जरा भी नहीं सुहाता
समझा कर के, दुलरा कर के मैं तो बस हारा ही हारा
उसके हठ के सम्मुख मेरी विनती रहना सके खड़ी
एक पुराना दर्द.....


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7. बैठो पथिक

बैठो पथिक जरा सुस्तालो
लथपथ देह पसीने से है
छांह में आओ तनिक हवा लो
बैठो पथिक.....
गांव, गली और खेत गुआड़ी
पथ, पगडण्डी तिरछी आड़ी
बाधाओं से अनगिन टीले
विविध रकम कंटक नूकीले
श्वेत मिट्टी की सड़क सजीली
ऊबड़-खाबड़ और पथरीली
नाप इन्हें तुम आए बढ़ते
धनी बड़े प्रण के दिख पड़ते
लेकिन क्या रस्ते में गुजरी
हाल जरा कहलो बतियालो
बैठो पथिक.....
अभी बहुत लम्बा पथ बाकी
तपती बालू रेत बलाकी
झुलस रही हैं दसों दिशाएं
नहीं उचित कि देह जलाएं
अभी नहीं स्वीकारेगा मन
परिभाषा चलना ही जीवन
यह मरुथल है मेरे साथी
तन जलता है प्यास सताती
खुश्क गले में अमृत जैसा
मटकी का ठण्डा जल ढ़ालो
बैठो पथिक.....
वहीं मिलेगा ठौर-ठिकाना
तुमको जहां तलक है जाना
लेकिन क्या जल्दी है भाई
धूप ले रही है अंगड़ाई
लूओं के ये तेज बवण्डर
बहते सांय-सांय का ले स्वर
अपनी कोमल देह टटोलो
रौद्र रूप दिनकर का तोलो
मूल्यवान सीकर के मुक्ता
धूल करो मत इन्हें संभालो
बैठो पथिक.....
मैं भी इसी राह का राही
बिल्कुल साथी हूँ तुम सा ही
जो ज्ञानीजन हमें सिखाते
उस पर नहीं चित्त क्यूँ लाते
पथ में कोई साथ मिले तो
बातों का कुछ दौर चले तो
हो जाता आसान सफर कुछ
लगती छोटी राह-डगर कुछ
कुछ पल पीपल छांव बैठकर
साथ चलूंगा बात न टालो
बैठो पथिक.....


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8. मैं शब्दों को.....

मैं शब्दों को स्वर ना देता, तो सरगम यूँ ही मर जाती
अपने अन्तस में न संजोता, तो पीड़ा किसके घर जाती
मरघट का सन्नाटा लेकर
पतझड़ ही पतझड़ छा जाता
उपवन की हर डाल सुलगती
कभी यहाँ मधुमास न आता
भाव सरित से अगर प्रीति को, सिंचित मैंने किया न होता
तो अपना ही रूप देख कर, स्वयं प्रकृति देवी डर जाती
मैं शब्दों को.....
घावों की बस्ती से हर पल
अन्तर्नाद धुम्र सा उठता
सपना बस सपना ही रहता
जीवन महा तमस से घुटता
हास और उल्लास भरी, आशा मैंने ना बाँटी होती
सच कहता हूँ सभी दिशाएं, सिर्फ वेदना से भर जाती
मैं शब्दों को.....
सौन्दर्य न सम्मोहक बन पाता
कुम्हलाई रहती तरुणाई
बिन उपमा अनवरत अकेली
हर चितवन रहती अनव्याही
चलता नहीं तिलस्म नृत्य का, नूपुर ध्वनि गूंगी ही रहती
गर गीतों की रागनियां, श्रृंगार नहीं इनका कर जाती
मैं शब्दों को.....
सागर की लहरे न उफनती
फूल न बन पाते अंगारे
मलय पवन तूफान न बनता
नहीं गूंजती धनु टंकारे
शंखनाद कर यदि पौरुष को, चिर निद्रा से मैं न जगाता
तो विप्लव की ज्वाला ना, लहराती हुई गगन पर जाती
मैं शब्दों को.....
ना होता स्वागत आगत का
ना अतीत ही अंकित होता
होता भाग्य धुमिल घटना का
बन इतिहास न संचित होता
मुक्त लेखनी, तीक्ष्ण नोक से, भोजपत्र ना मेरी लिखती
तो सारा अस्तित्व विगत का, क्रूर काल की गति चर जाती
मैं शब्दों को.....


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9. किसलिए

मेरे भीतर का तपःपुरुष मरता नहीं है किसलिए?
अथवा छल का रूप ये धरता नहीं है किसलिए?
बोझ बन कर रह गई है सत्य की गंगाजली
सोच नेकी की न ढंग से कुछ कदम भी संग चली
पात्र बस उपहास के बन रह गए सिद्धान्त सारे
भावनाएं ठोकरें खाती फिरी हैं हर गली
सत्य तो ये है कि बिन साधन वृथा है साधना
स्वीकार इस कटुता को ये करता नहीं है किसलिए?
मेरे भीतर का.....?
त्याग ने तो तिक्तता हर क्षण को दी उपहार में
करुणा भी सिसकी सदा मुखौटों के बाजार में
धैर्य बन कर रह गया है जड़ता का पर्यायवाची
और समर्पण ने डुबोया प्रश्नों के मझधार में
शीलता ने पोत दी चेहरे पे कायरता की कालिख
देख इस सूरत को यह डरता नहीं है किसलिए?
मेरे भीतर का.....?
संबंध सारे बर्फ बन हथेलियों पर जम गए
मूल्य प्रीत के औपचारिकता से आंके कम गए
भलमनसाहत सिर्फ भूखी आंत सहलाती रही
आस्था के पैर अंगारों पे आकर थम गए
ताक पर धरता नहीं है धर्म, सागर अर्थ का
स्वार्थ की पतवार ले तरता नहीं है किसलिए?
मेरे भीतर का.....?
अभाव की पगडण्डियों पर दर्द की लाठी टिकाए
बस रहा चलता लिए कांधे की गठरी में व्यथाएं
तरुणाई में प्रोढ़ इच्छाओं की मृत्यु कर गई
सरलता ने सर्वदा प्याले गरल के ही पिलाए
बदले जीवन अर्थ लख आकांक्षाओं की कुटी से
आपदाओं का तिमिर हरता नहीं है किसलिए?
मेरे भीतर का.....?
मूर्खता है या कि हट कहता है बस यूं ही जिऊँगा
चाह की चादर फटी सौ बार भी तो फिर सिऊँगा
मान से अपमान से हटकर चलूँगा उम्र भर
जीवन अमृत ही सही पर मैं हलाहल ही पिऊँगा
प्यार है पतझड़ से काटों को लगाता है गले
ऋतुराज के रंग गीत में भरता नहीं है किसलिए?
मेरे भीतर का.....?


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10. एक गीत

जब दर्द और गहराता है
एक गीत रचा तब जाता है
जब छलता है एकाकीपन
व्याकुल हो भटका करता मन
लेकर अतीत की घड़ियों को
चिन्तन फिर से दुहराता है
एक गीत.....
सौन्दर्य कोई निर्मल निश्छल
कर जाता अंतस में हलचल
जिसकी विस्तृत परिभाषा को
मस्तिष्क न भाषा पाता है
एक गीत.....
प्राची में रवि उदितमान
लाता है स्वर्णिम नव विहान
लख-लख अम्बर की लाली को
खिल कर प्रसून मुस्काता है
एक गीत.....
धवल तुषार किरीट पहन
हिम चोटी दिखती श्वेत गहन
मलयानिल का झौंका आकर
पाषाणों को दुलराता है
एक गीत.....
संध्या का रमणिय हो काल
क्षितिज में ज्यूं छिटकी गुलाल
विजन प्रांत में बैठ कहीं
उर अगणित नक्ष बनाता है
एक गीत.....
तिल-तिल कहीं पे जलती हो
अनवरत अकेली दीपक लौ
प्रीत प्रतीक शलभ आकर
उस पर निज प्राण गंवाता है
एक गीत.....
प्रेयसी कल्पना बन कर
लेती है आलिंगन में भर
दिवसावसान कर देने को
कुंतल समूह लहराता है
एक गीत.....
अभिलाषा रूप दुल्हन का ले
बैठे सम्मुख घूँघट डाले
लज्जा नारी का भूषण भी
जिस पल नहीं सुहाता है
एक गीत.....
निंदियारी पलको में डोले
आ स्वप्न कोई हौले-हौले
सम्पूर्ण गात को अनजानी
सिहरन से सिहराता है
एक गीत.....
अर्धनिशा में प्यासा उर
हो प्रणय निवेदन को आतुर
इस पर प्रेयसी का वियोग
गरल समान लखाता है
एक गीत.....
अम्बर का तज कर आँचल
पुष्प-पात पर ठहरे जल
तुहिन कणों में मुक्ता का
प्रतिबिंब नजर जब आता है
एक गीत.....
मदमाता मादक बसन्त
बिखराता सौरभ अनन्त
अपनी सम्मोहन शक्ति से
कोयल की कूक जगाता है
एक गीत.....
अश्रु लगे प्रिय सावन से
पीड़ा न पृथक हो जीवन से
उर तृष्णा की तृप्ति हेतु
कर बढ़ कर कलम उठाता है
एक गीत.....


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11. आस

अंतस में मधुमास लिए
नयनों में विश्वास लिए
घूम रहा हूँ पनघट पनघट
एक अनबुझी प्यास लिए
बंजारा मन गाता रहता
गीत प्यार के गली-गली
कल्पना को छलता निष्ठुर
एकाकीपन बड़ा छली
थके चरण यूँ देते ढ़ाढस
हर ठोकर पर ही प्रण को
कैसे तम का भेदन होगा
दीप शिखा गर नहीं जली
कटंक पथ पर चली भावना
अति कोमल अहसास लिए
घूम रहा हूँ.....
मेरा साथ निभाने का भी
निर्णय कोई समझ करेगी
कभी चाह के सागर तल में
कोई तो धड़कन उतरेगी
गंतव्य बताएगा इंगित कर
मुझको मेरा कोई हितैषी
कोई तुलिका कभी सपन की
कोरी छवि में रंग भरेगी
शब्दों का काफिला चला तो
केवल ये ही आस लिए
घूम रहा हूँ.....

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1 टिप्पणी:

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar ने कहा…

हुज़ूर...नमस्कारम्‌!
आज मैंने आपको खोज ही लिया। आद. श्री कौशिक जी का आभारी हूँ कि उन्होंने मेरा संदेश आप तक पहुँचाया।

वीणा पर यूँ उदासी का छाना और साध के व्याकरण का उल्टा हो जाना आपके कवि को आहत करता है, स्वाभाविक ही तो है। लेकिन ऐसे में भी कवि का निराश न होना बहुत आशावादी संकेत है-

"साध का उल्टा हुआ है व्याकरण भी
पर धड़कती है अभी आशा जरा-सी
आज वीणा पर सघन छाई उदासी"

आपका स्वागत है यहाँ पर- http://jitendrajauhar.blogspot.com/2010/10/blog-post_30.html#comments

प्रकाशक के बारे में

मेरी फ़ोटो
बिहार के कटिहार में जन्म, साहित्य जगत में किसी का नाम स्वतः नहीं होता, उसे कुछ लिखना ही होगा, भले ही लेख, कहानी या कविता हो, शम्भु चौधरी ने कई लघुकथाऎं/कविता/सामाजिक लेख लिखें हैं। इनका जीवन सामाजिक कार्यों में ही गुजर गया, वर्तमान में आप कोलकाता से प्रकाशित 'समाज विकास' पत्रिका के कार्यकारी सम्पादक हैं और इस वेव पत्रिका 'नया समाज' के सम्पादक। आपकी एक पुस्तक "मारवाड़ी देस का न परदेस का" विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर लिखे इनके लेखों का संग्रह प्रकाशित।